Friday, June 1, 2012

Viewpoints

दृष्टिकोण



कहना कठिन है कि कौन सही है और क्या उचित है .
सब ही अपनी अपनी जगह सहीं है और अपने निजी ब्रह्मांड में सत्य की पहचान हैं

हाँ ,  जब इन सभी ब्रह्मांडों को समूह में लिया जाता है तो न तो ये एक दुसरे को प्रभावित करने से चूकते हैं न ही
 खुद अप्रभावित रह पाते हैं .  तब सत्य का मापदंड भी बदल जाता है - विश्व व्यापी एक और सत्य उभरता है - सामाजिक सत्य .
दूसरो पर आश्रित ? नहीं ! जरूरी नहीं मगर दूसरों से जुड़े हुए फिर भी . कोई किसी पर आश्रित नहीं , पर सभी एक दूसरे से बंधे हुए , उन बन्धनों से जिन्हें हम समाज का नाम देते हैं .

स्वयं को संतुष्ट करना कि हमारे प्रयास सर्वथा उचित हैं , हमारी विचारधारा सही नक्शोकदम पर चल रही है , ये कोई मुश्किल बात नहीं है - वो तो जब दृष्टिकोण टकराते हैं और कोनों पर पूरक नहीं बनते , तभी दुष्कर होता है कोई समझौता होना

रही बात सत्य की - तो सत्य की सत्यता परखने का कोई मापदंड होना चाहिए . दो तरह के मापदंड हो सकते हैं - समय के साथ बदलने वाले या अपरिवर्तित - दृढ़ . जहाँ एक तरफ बदलाव गतिशीलता की मांग है, वहीँ ये डर भी है की कहीं जाने अनजाने में हम ( समाज) अपनी सुविधा के नुकूल इन मापदंडो को तोड़ मरोड़ न ले . फिर शुरू होगा दौर कुहांसे का - किसी खिड़की से चमकता दिया या फिर सूर्य - समझ में नहीं आएगा। यह जरूरी है कि अपने निजी दिये को सूर्य मानने की गलती न हो . यहीं अंतर निहित है  छोटे छोटे व्यक्तिगत सत्यों का और सामाजिक सत्य का- यहीं भिन्नता है >

जब कभी करोडो के बीच कोई एक व्यक्तिगत दिया सौर्य उर्जा से चमकने लगता है - तब होता है समाज में कुछ ऐसे लोगों का आगमन जिन्हें हम महात्मा या तुल्य ओहदा देते हैं - उधारण महात्मा गाँधी

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