Saturday, August 30, 2014

धरती का श्रृंगार
















प्रभात प्रकाश प्रज्वलित प्राणंग
नीलिमा आवर्तित ये गगन आँगन
अलौकिक आकर्षक दमकते आभूषण
धरती का श्रृंगार रचाते सुदर्शन

ओस की दमकती मोतियों की लड़ी
सुनहरे जालों पर ये मढ़ चली
इस अलौकिक हार की छठा
सूर्य का मांग टीका बादलों की घटा
गुलाब बेला  का इत्र फैलाती ये हवा
रंगीन फूलों की ओढनी ले चली उड़ा 

Sunday, August 24, 2014

हर शख़्स सही


किस डगर चले
किस ओर चले
क्या बुलाए तुम्हे
क्यों उधर चले

सब समान है
ये जो जहाँ है
हर मोड़ वही
हर शख़्स सही

जो सुनी नहीं
वोह आवाज़ थी
किस मुकाम से
ये खबर नहीं


जो सही लगे
वोह भी गलत है
और जो गलत लगे
वोह भी सही है

कौन से चश्मों से देखा जहाँ
बस वहीँ से अंतर दिख गया
मन का यह जो  दर्पण है
अजब ही यह विलक्षण है
जिसने मन को थाम लिया
बस उसी का जीवन सक्षम है



Tuesday, August 19, 2014

jindagi



जिन्दगी की जो  पहेली  है
बूझते हुए गुजर जाती है
कभी चलती  धीरे  सुर ताल की लय में
कभी दौड़े बवंडर में  बदहवास सी
कभी कुछ असमंजस भरे पल
कभी यूँ ही बेवजह मुस्कराती सी
इन हैरानियों में बढ़ते जाना ही
नाम है वक्ते-कैद  जिंदगी का 

 कुछ पंक्तियाँ जीवन की डगर पर चलते कुछ कदम  ये ऊंची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी  सी कठिन डगर  हे पथिक - ये जाना तुमने ?  मार्ग मनःस्ति...