Saturday, September 13, 2014

क्यों लिखा और क्या लिखा






क्यों लिखा और क्या लिखा


लिखने वाले ने जब लिखा
कहाँ से लिखा और क्यों लिखा
कभी यहाँ से कभीं वहां से
कभी कुछ सोचा
कभी कुछ देखा
कभी कुछ यूँ ही
कभी बे वजह ही
फिर भी  जब लिखा तो
अगर अच्छा लिखा
तो बहुतो को लगेगा
उनपर लिखा

यह भ्रम है
लेखक ने हमेशा
खुद से खुद के लिए
और खुद के विचार लिखें

जो वो सबको  अपने पर लगे
तो लेखन की लेखनी सफल

Friday, September 12, 2014

ऑंखें मन का दर्पण है







ऑंखें मन का दर्पण है
ऐसा कुछ सुनने में आया था
अकसर ये बयां करती 
वो जो नज़र ना आता है 

कभी चमकती शरारतों से
कभी  कुछ कहानी कह जाती
निर्मल, निश्छल ये छलकाती
कोरों  से धारा बह जाती

आँखें मन का ही नहीं
उम्र का भी हाँ दर्पण हैं
इन आँखों में जो  देखो तो
उम्र है असली नजर आती
कुछ वर्ष , कुछ सदियाँ ये बूझो 
ये तासीर - ए - उम्र बता जातीं

Friday, September 5, 2014

जिनसे हमने पढ़ना सीखा




शब्दों का कोई मोल नहीं है
लफ्जों का कोई तोल  नहीं है


उन सबसे जिनसे हमने पढ़ना सीखा
जीना सीखा हँसना सीखा

धीरज से या क्रोध सहित
प्यार भरे अनुशाशन मिश्रित
सबको  राह दिखलाते जो
जीवन के पहलू समझाते जो

कुछ ऐसे विरले गुरु मिले
जो बिना बोले ही सिखला गए
हाथ पकड़ के न सिखलाया
खुद के उदहारण से समझा गए


वो सदियों से ज्ञान बाटने वाले
उन सभी को शत नमन है

 कुछ पंक्तियाँ जीवन की डगर पर चलते कुछ कदम  ये ऊंची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी  सी कठिन डगर  हे पथिक - ये जाना तुमने ?  मार्ग मनःस्ति...