Friday, February 15, 2019





चाँद

और बाहर जाते ही दिखा था वो
चढ़ता हुआ , घटता हुआ
हँसता हुआ , बिलखता हुआ
कभी आधा , कभी पूरा
कभी दमकता हुआ और
कभी अपने दुःख के कालापानी
में पूर्ण रूप से डूबा हुआ।

चांदी सा चमकता हुआ
कभी हीरे की पतली लड़ी
सा यूँ ही दमकता हुआ।
कभी बूढी दादी के चरखे
को प्रतिबंबित करता हुआ
और कभी ईद के सितारे
के सामीप्य में आकाश को सजाता हुआ





वक़्त 

यह वक़्त का तक़ाज़ा है
कि वक़्त ही तो महंगा है
एक वक़्त जब सीखा नहीं
अब हर वक़्त कुछ सिखाता है


इस वक़्त विशक्त के चक्कर में
हर वक़्त ये हैरानी कैसी है
जो बीत गया सो कहानी है
अब आगे की जिंदगी निभानी है







कोपल

कोपल अनमनी सी आँख खुली
क्या धूप निकली झुटपुटी सी ?
हरित वातावरण को निहारते
उसी हरियाली में से झांकते 
लघु पौधे समेटते सूर्य प्रकाश सकल 
धरती की गोद में पावन संचित जल 

कोपल अनमनी सी आँख खुली
क्या सूर्य बढ़ा शिखर की ओर ?
ये ब्रह्मांड एक पाठशाला नयी
इसमें ढूंढते, गूढ़ पुराने प्रश्न वही
वातावरण को समेट सीखते हर पल
क्या राह चुने ये ढूंढते व्याकुल 

कोपल अनमनी सी आँख खुली'
क्या धूप चढ़ी क्षितिज के पार ?
लम्बी डगरों के पार्श्व में
बांटते राहियों कि टोह में
चढ़ती धूप में छाँह निर्मल
लम्बी राहों के ये सम्भाल 

कोपल अनमनी सी आँख खुली
क्या लालिमा ये शाम की ?
ये जीवन सकल ये बीत गया
क्या सीखा क्या दिया यहाँ
पल , समय का ये घूमता मंडल
पूछता लेखा जीवन का ये अंचल


 कुछ पंक्तियाँ जीवन की डगर पर चलते कुछ कदम  ये ऊंची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी  सी कठिन डगर  हे पथिक - ये जाना तुमने ?  मार्ग मनःस्ति...