किस डगर चले
किस ओर चले
क्या बुलाए तुम्हे
क्यों उधर चले
सब समान है
ये जो जहाँ है
हर मोड़ वही
हर शख़्स सही
जो सुनी नहीं
वोह आवाज़ थी
किस मुकाम से
ये खबर नहीं
जो सही लगे
वोह भी गलत है
और जो गलत लगे
वोह भी सही है
कौन से चश्मों से देखा जहाँ
बस वहीँ से अंतर दिख गया
मन का यह जो दर्पण है
अजब ही यह विलक्षण है
जिसने मन को थाम लिया
बस उसी का जीवन सक्षम है

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