Sunday, August 24, 2014

हर शख़्स सही


किस डगर चले
किस ओर चले
क्या बुलाए तुम्हे
क्यों उधर चले

सब समान है
ये जो जहाँ है
हर मोड़ वही
हर शख़्स सही

जो सुनी नहीं
वोह आवाज़ थी
किस मुकाम से
ये खबर नहीं


जो सही लगे
वोह भी गलत है
और जो गलत लगे
वोह भी सही है

कौन से चश्मों से देखा जहाँ
बस वहीँ से अंतर दिख गया
मन का यह जो  दर्पण है
अजब ही यह विलक्षण है
जिसने मन को थाम लिया
बस उसी का जीवन सक्षम है



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