ऑंखें मन का दर्पण है
ऐसा कुछ सुनने में आया था
अकसर ये बयां करती
वो जो नज़र ना आता है
कभी चमकती शरारतों से
कभी कुछ कहानी कह जाती
निर्मल, निश्छल ये छलकाती
कोरों से धारा बह जाती
आँखें मन का ही नहीं
उम्र का भी हाँ दर्पण हैं
इन आँखों में जो देखो तो
उम्र है असली नजर आती
कुछ वर्ष , कुछ सदियाँ ये बूझो
ये तासीर - ए - उम्र बता जातीं

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