कोपल
कोपल अनमनी सी आँख खुली
क्या धूप निकली झुटपुटी सी ?
हरित वातावरण को निहारते
उसी हरियाली में से झांकते
लघु पौधे समेटते सूर्य प्रकाश सकल
धरती की गोद में पावन संचित जल
कोपल अनमनी सी आँख खुली
क्या सूर्य बढ़ा शिखर की ओर ?
ये ब्रह्मांड एक पाठशाला नयी
इसमें ढूंढते, गूढ़ पुराने प्रश्न वही
वातावरण को समेट सीखते हर पल
क्या राह चुने ये ढूंढते व्याकुल
कोपल अनमनी सी आँख खुली'
क्या धूप चढ़ी क्षितिज के पार ?
लम्बी डगरों के पार्श्व में
बांटते राहियों कि टोह में
चढ़ती धूप में छाँह निर्मल
लम्बी राहों के ये सम्भाल
कोपल अनमनी सी आँख खुली
क्या लालिमा ये शाम की ?
ये जीवन सकल ये बीत गया
क्या सीखा क्या दिया यहाँ
पल , समय का ये घूमता मंडल
पूछता लेखा जीवन का ये अंचल
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