चाँद
और बाहर जाते ही दिखा था वो
चढ़ता हुआ , घटता हुआ
हँसता हुआ , बिलखता हुआ
कभी आधा , कभी पूरा
कभी दमकता हुआ और
कभी अपने दुःख के कालापानी
में पूर्ण रूप से डूबा हुआ।
चांदी सा चमकता हुआ
कभी हीरे की पतली लड़ी
सा यूँ ही दमकता हुआ।
कभी बूढी दादी के चरखे
को प्रतिबंबित करता हुआ
और कभी ईद के सितारे
के सामीप्य में आकाश को सजाता हुआ

No comments:
Post a Comment